एसआईआर और जनगणना 2029 के वोटर मैप को बदलेगा और दक्षिण राज्यों के साथ हो सकता है खेल 

कब की राजनीति कहां फिट बैठेगी और फिर बीजेपी को कहाँ कैसा लाभ मिलेगा यह आम आदमी को पता नहीं। विपक्ष भी अभी शायद मोदी सरकार के भविष्य के खेल को नहीं समझ रहा है और अगर समझ भी रहे हैं तो कुछ करने के काबिल नहीं रह गए हैं। संघ और मोदी सरकार का यह एक ऐसा खेल है जिसके तहत कई टारगेट को साधने की कोशिश की जा रही है। अभी कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों को भले ही यह लगे कि एसआईआर के जरिये वोट चोरी की कहानी रची जा रही है और उनके वोट बैंक को मतदाता सूची से हटाया जा रहा है लेकिन सच यह भी है कि मोदी सरकार का यह खेल बहुत आगे का है। खासकर 2029 के सफल चुनाव का। 2029 के चुनाव में भी बीजेपी और संघ की कोशिश है कि उसे बड़ी सफलता मिले और सत्ता उसके हाथ हो।

संघ और बीजेपी की यह भी कोशिश है कि 2029 के चुनाव के साथ ही एक देश एक चुनाव को लागू किया जाए। यानी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जा सकें। इसके साथ ही दक्षिण के राज्यों में जहाँ बीजेपी की पैठ अभी कमजोर है वहां की लोकसभा और विधान सभा सीटों को कम किया जाए और इसके लिए 2026 से शुरू हो रहे जनगणना की शुरुआत भी कर दी जाएगी जो लगभग 2028 के अंतिम महीनों तक संभव हो पायेगा। इस जनगणना का बड़ा असर होगा और परिसीमन को लेकर जनगणना का डाटा एक महत्वपूर्ण तर्क भी हो सकता है। 

मौजूदा जारी एसआईआर भारत के 2029 के वोटर मैप को पूरी तरह से बदल देगा और जब यह बदलेगा तो कई चीजें भी बदल जाएँगी। याद रहे बिहार में संपन्न हुए एसआईआर के बाद जिन 12 राज्यों में अभी एसआईआर चल रहे हैं उनमें से तीन राज्य उत्तर प्रदेश, गोवा और गुजरात में 2027 में चुनाव होने हैं जबकि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2028 में चुनाव होने हैं। बिहार चुनाव के दौरान शुरू हुए एसआईआर में काफी बवाल भी हुए। कांग्रेस की तरफ से वोट चोरी के गंभीर आरोप भी लगे लेकिन हुआ वही जो चुनाव आयोग चाहता था। चुनाव हुए और परिणाम भी आये। एनडीए की बड़ी जीत भी हुई और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार भी बनी। यह बात और है कि नीतीश कुमार कब तक सत्ता की कुर्सी पर बने रहते हैं।

इसे राजनीतिक खेल पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन मजे की बात तो यह है कि अभी हाल में ही मोदी सरकार के एक मंत्री जीतन राम मांझी जिनकी पार्टी बिहार एनडीए की सहयोगी भी है और बिहार सरकार में शामिल भी है, की तरफ से एक ऐसा बयान सामने आया है जो गंभीर सवाल खड़े करता है और चुनाव आयोग की सच्चाई का बखान भी करता है। इसके साथ ही विपक्ष द्वारा उठाये गए वोट चोरी की बानगी भी पेश करता है। मांझी ने एक सार्वजनिक सभा में कहा कि 2020 के चुनाव में उनका एक उम्मीदवार हार रहा था। उम्मीदवार ने उनसे संपर्क साधा और उन्होंने स्थानीय ड़ीएम से बात कर उस हारते उम्मीदवार को जिता दिया। मांझी यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने यह भी कहा कि इस बार के चुनाव में भी वह उम्मीदवार पहले ही मैदान छोड़कर भाग गए। अगर वे संपर्क करते तो उनकी जीत भी पक्की थी लेकिन उन्होंने पहले ही हार मान ली। 

मांझी का यह बयान साफ़ बता रहा है कि चुनाव को मैनेज किया जाता है और हारते उम्मीदवार को भी जिताया जा सकता है। अब बड़ी बात तो यह है भाई कि चुनाव आयोग मांझी के इस बयान के बाद भी मौन है। न तो चुनाव आयोग ने मांझी से कोई पूछताछ की है और न ही उस ड़ीएम से ही। जबकि चुनाव आयोग अभी हाल के चुनाव में ही कई लोगों को नोटिस जारी कर सवालों का उत्तर चाहता रहा है। अब चुनाव आयोग मांझी के बयान पर क्यों चुप है यह गंभीर सवाल है। ऐसे में विपक्ष द्वारा वोट चोरी के नारे लग रहे हैं और खासकर राहुल गाँधी द्वारा इसे एक बड़ा मुद्दा बताया जा रहा है तो इसमें मौजूदा सरकार और चुनाव आयोग को सामने आकर जवाब तो देना ही चाहिए। लेकिन सच तो यही है कि जवाबदेही से अब तक सरकार और चुनाव आयोग भागते ही रहे हैं। 

उम्मीद की जा रही है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले तक चुनाव आयोग पूरे देश के राज्यों में एसआईआर करता रहेगा और हर राज्य से वोटों की छटनी भी होती रहेगी। अभी तमिलनाडु, बंगाल और गुजरात से भी एसआईआर के तहत बड़ी मात्रा में वोट काटे जाने की कहानी सामने आयी है। तमिलनाडु में जहां 97 लाख से ज्यादा वोट काटे गए हैं वहीं गुजरात से 73 लाख और बंगाल से करीब 58 लाख से ज्यादा वोट काटे गए हैं। पहले यह कहा जा रहा था कि घुसपैठियों की पहचान ज़रूरी है और उन्हें मतदाता सूची से हटाया जाएगा। लेकिन अभी तक इनमें कितने घुसपैठिये हैं इसका कोई आंकड़ा पेश नहीं किया गया है। केवल यही कहा गया है कि जो लोग राज्य से बाहर चले गए हैं और जिनकी मृत्यु हो गई है उन्हें मतदाता सूची से अलग किया गया है। इसके साथ ही जिनका नाम कई बार देखा गया है उन्हें भी हटा दिया गया है। 

सामान्य वार्षिक अपडेट के विपरीत, SIR में एक कठोर “गहन” जाँच शामिल होती है, जिसमें अक्सर घर-घर जाकर सत्यापन की आवश्यकता होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में, ECI ने 12 विशिष्ट राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR आयोजित करने का फैसला किया, जिनमें से पाँच में अगले साल चुनाव होने हैं।

अभी 12 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश हैं जहाँ एसआईआर चल रहे हैं। ये राज्य हैं  छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल और 3 केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी। इनमें से पाँच (केरल, बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम) में 2026 में चुनाव होने हैं। असम में भी 2026 में वोटिंग होगी, लेकिन इसका कार्यक्रम अन्य राज्यों के साथ घोषित नहीं किया गया था। इसके अलावा, असम के लिए यह प्रक्रिया अलग है क्योंकि यहां के निवासियों को इन्यूमरेशन फॉर्म भरने की जरूरत नहीं है, जैसा कि दूसरे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में जरूरी है।

इन सभी राज्यों के अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के शेड्यूल में अब तक कोई बदलाव नहीं किया गया है – जो 14 फरवरी, 2026 है। शिकायतों और उनके समाधान के साथ – यह पूरी प्रक्रिया इन 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी हो जाएगी, असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में चुनावों की तैयारी शुरू हो जाएगी। 

लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि यह सब महत्वपूर्ण क्यों है? सच यही है कि यह सारा खेल 2029 के चुनाव को देखते हुए किया जा रहा है। जिन राज्यों में अभी चुनाव आयोग एसआईआर करवा रहा है उनमें से तीन उत्तर प्रदेश, गुजरात और गोवा में 2027 में चुनाव होंगे और तीन राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2028 में। यह प्रक्रिया संकेत देती है कि चुनाव पैनल धीरे-धीरे पहले उन सभी राज्यों में चुनावी सूचियों को संशोधित कर रहा है, जहां अगले कुछ वर्षों में – 2029 तक चुनाव होने हैं। उम्मीद है कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग पूरे देश में संशोधन पूरा कर लेगा।

अब जानकार मान रहे हैं कि यह सारा खेल 2029 में बीजेपी की बड़ी जीत की तैयारी है और इसके साथ ही एक देश, एक चुनाव प्रणाली को लागू करने की तैयारी भी है। लोकसभा ने हाल ही में एक देश एक चुनाव बिलों की जांच करने वाली संसदीय समिति का कार्यकाल बजट सत्र 2026 के आखिरी सप्ताह तक बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है कि 2029 तक एक देश एक चुनाव एक वास्तविकता बन सकता है।

इस पहेली का एक अंतिम, विस्फोटक हिस्सा है जनगणना। महामारी के कारण 2021 से लंबित जनगणना 2029 से पहले पूरी होने की उम्मीद है। इसका डेटा परिसीमन- संसदीय सीटों के पुनर्निर्धारण का आधार बनेगा। इससे दक्षिणी राज्यों में खतरे की घंटी बज गई है। उनका तर्क है कि आबादी के आधार पर सीटों का बंटवारा सफल परिवार नियोजन के लिए उन्हें गलत तरीके से सज़ा देगा, जिससे लोकसभा और राज्य सभा में उनकी सीटों का हिस्सा कम हो जाएगा, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों को ज़्यादा सीटें मिलेंगी। एक देश एक चुनाव के साथ मिलकर एसआईआर केवल एक लिस्ट अपडेट भर नहीं है, यह 2029 से पहले होने वाले बड़े राजनीतिक और डेमोग्राफिक बदलाव को चलने वाले मुख्य स्तम्भों में से एक भी है। 

एसआईआर और जनगणना के बाद परिसीमन की कहानी शुरू हो जाएगी। तमिलनाडु के मौजूदा मुख्यमंत्री बार-बार यह कहते रहे हैं कि जनसंख्या के आधार पर जैसे ही परिसीमन की शुरुआत होगी, दक्षिणी राज्यों की सीटों पर तलवार लटक जाएगी। यह बात और है कि अमित शाह यह बार-बार कहते रहे हैं कि परिसीमन के दौरान दक्षिण के राज्यों को कोई घाटा नहीं होगा और न ही कोई सीटें कम होंगी। लेकिन जब जनसंख्या को आधार बनाया जाएगा तब शाह की जुबानी बातें कहाँ काम आएँगी? तमिलनाडु में अभी लोकसभा की 39 सीटें हैं और जिस तरह से तमिलनाडु की आबादी सिमटती गई है उसके मुताबिक़ तमिलनाडु की लोकसभा सीटें घटकर 31 हो सकती हैं। याद रहे दक्षिण के राज्यों ने अपनी जनसंख्या पर काफी हद तक काबू पा लिया है जबकि उत्तर भारत के राज्यों की जनसंख्या बढ़ती गई है और ऐसी ही परिस्थिति में यह माना जा रहा है कि यूपी और बिहार वाले सघन आबादी वाले राज्यों की लोकसभा सीटें काफी बढ़ सकती हैं। 

2026 में उपलब्ध होने वाले ताजा जनगणना डेटा का उपयोग पूरे देश में परिसीमन के लिए किया जाएगा। इसके लिए जो परिसीमन आयोग स्थापित किया जाएगा, उसमें सभी दलों के प्रतिनिधि होंगे, ताकि वे अपने विचार पेश कर सकें। यह संभवतः 2029 के लोकसभा चुनावों का आधार बनेगा। केंद्र का कहना है कि दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित नहीं किया जाएगा और उनकी लोकसभा सीटों की संख्या में कमी नहीं होगी। 

बता दें कि परिसीमन अभ्यास का उद्देश्य सभी राज्यों में लोकसभा और विधानसभाओं के लिए सीटों की संख्या और क्षेत्रीय सीमाओं को तय करना है। एससी-एसटी आरक्षित सीटें भी इसी के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। अंतिम परिसीमन आयोग, 2002 में स्थापित किया गया था, जबकि अंतिम परिसीमन अभ्यास 1976 में पूरा हुआ था। परिसीमन का निर्धारण प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा में सीटों के आवंटन के फार्मूले से किया गया है। इसलिए, सीटों को जनसंख्या में बदलाव के अनुसार समायोजित किया जाना चाहिए। 

जहां तक एक साथ चुनाव कराने की बात है और यह तय हो जाता है कि 2029 में ‘एक देश एक चुनाव’ की प्रणाली शुरू हो जाएगी तब इस बात की सम्भावना है कि  2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा विधानसभा चुनाव अगले दो सालों के लिए होंगे। विशेषज्ञों की मानें तो वैसे तो इन राज्यों के कार्यकाल संविधान संशोधन के जरिए बढ़ाए भी जा सकते हैं, लेकिन ऐसा होने पर विपक्षी दल सवाल खड़ा करेंगे। ऐसे में बची अवधि के लिए चुनाव कराना सही विकल्प होगा। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव हैं, जबकि वर्ष 2028 में दस राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, मिजोरम, छत्तीसगढ़ और राजस्थान शामिल हैं।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply